00 चीन के लिए हिन्द का मास्टर प्लान | Bazinga

चीन की नाफ़रमानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं इसलिए भारत और चीन का आपसी रिश्ता एक गंभीर और खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। केंद्र सरकार और देश के सामने बड़ा सवाल यही है कि गलवान घाटी में जो ताजा हिंसक झड़प हुई है, जिसमें हमारे 20 अफसर और जवान शहीद हुए, उसका किस तरह से जवाब दिया जाए? आज की स्थिति को देखते हुए हमारी चीन-नीति क्या हो? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें भारत-चीन संबंधों की हकीकत का इतिहास जानना बहुत जरुरी है।


आजादी मिलने के बाद से ही चीन हमारे लिए सबसे बड़ी सामरिक चुनौती रहा है जबकि हमारा मानना था कि दोनों देश विकासशील हैं, इसलिए उनके हितों में समन्वय बनाया जा सकता है। भारत जहां शांति के पथ पर चल रहा था, वहीं चीन ने सन 1962 में भारत पर हमला बोल दिया, जिसमें हमें भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस युद्ध के बाद भारत और चीन के संबंध सीमित हो गए। चीन ने इस्लामाबाद और दिल्ली की पारंपरिक दुश्मनी का वह फायदा उठाने के लिए पाकिस्तान से अपने रिश्ते सुधारने शुरू कर दिए। उसने पाकिस्तान की आर्थिक-सामरिक ताकत को मजबूत किया, यहां तक कि उसके परमाणु हथियार कार्यक्रम को भी बुनियादी तौर पर सहायता पहुंचाई।

सन 1967 में सिक्किम में भारत-चीन नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों द्वारा घुसपैठ में हुई झड़प में हमारे 88 सैनिक शहीद हुए थे, जबकि 300 से ज्यादा चीनी सैनिकों की जान गई। दूसरी झड़प 1975 में अरुणाचल प्रदेश में हुई थी उसमें अचानक ही असम राइफल्स के जवानों पर हमला किया गया था। इसके बाद अब तक कई बार भारत और चीन के सैन्य ‘गश्ती’ दल में आपसी टकराव तो हुए, लेकिन किसी सैनिक ने जान नहीं गंवाई। वर्ष 1988 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री-काल में भारत ने अपनी चीन-नीति बदली। यह तय किया गया कि बीजिंग के साथ सीमा-विवाद सुलझाने की कोशिश तो होगी, लेकिन साथ-साथ आर्थिक व व्यापारिक रिश्ते में सुधार किया जायेगा।

दिक्कत यह रही कि 1988 की नीति में सीमा-विवाद सुलझाने की बात तो कही गई, लेकिन चीन ने कभी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यहां तक कि नियंत्रण रेखा को लेकर उसने अपना रुख अब तक स्पष्ट नहीं किया है। चीन के इस हिंसक रवैये का हमें पूरी कठोरता के साथ मुकाबला करना होगा। चीन , भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कम करना चाहता है लेकिन हमें अपनी अर्थव्यवस्था की रक्षा करते हुए चीन के साथ अपने आर्थिक और व्यापारिक संबंधों की भी समीक्षा करनी होगी। इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान पर आत्मविश्वास से आगे बढ़ना होगा, और मेन्यूफेक्चरिंग के मामले में देश को आगे ले कर जाना होगा।

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