00 इतना दूर चला जाऊं कि जहाँ से फिर और दूर न जाना पड़े… | Bazinga

दुनिया के सर्वकालिक महान फिल्मकारों में शुमार गुरु दत्त को कौन नहीं जानता । फिल्मों में खामोशी भरे दृश्य को भी लाइट और कैमरा की मदद से सफल बनाने वाले गुरु दत्त पहले ऐसे निर्देशक थे, जिन्होंने दर्शकों को फिल्मों की बारीकियों से रूबरू करवाया। निर्देशक के रूप में इनकी विशिष्ट शैली ही इन्हे अपने समय से आगे के फ़िल्मकार बनाती है। गुरु दत्त अनगिनत रिटेक लेते थे और सीन को तब तक शूट करते थे जब तक वो खुद और फ़िल्म के बाकी कलाकार संतुष्ट न हो जाएं। वो जितनी फुटेज में एक फ़िल्म बनाते थे उतने में तीन फ़िल्में बन सकती थीं।

गुरुदत्त अपने कैमरे के जरिए एक विलक्षण दुनिया रचते रहे। उनका कैमरा एक मासूम प्रेमी की तरह रहा जो बड़ी तसल्ली और निश्छलता से महिला पात्रों को निहारता और उन्हें तराशता दिखता । ख़ासकर इश्क के शरारती मिजाज़ को इस अंदाज में कैद करता कि दर्शक जब-जब इसे देंखे, मोहब्बत के अपने खूबसूरत एल्बम को टटोलने लगें। कई बार गुरुदत्त करेक्टर की भावनाओं की अभिव्यक्ति से ज्यादा उससे उपजने वाली प्रतिक्रिया को कैद करने को अहमियत देते हैं , इसलिए उनका कैमरा किसी करेक्टर की रिएक्शन लेने के लिए एक सीधी लाइन में उसकी तरफ़ बढ़ता या ”ज़ूम इन” करता दिखता है। कई बार ‘ज़ूम इन’ करने के बजाए वो अपने करेक्टर को ही थिएटर के अंदाज़ में खुद आगे चलकर आने को कहते हैं , इसलिए गुरुदत्त की फिल्म में आपको अक्सर पात्र अँधेरे से रोशनी की ओर आगे आते नज़र आयेंगे।

फिल्म “कागज़ के फूल” को उनके जीवन की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म के रूप में माना जाता है, जिसके लिए गुरु दत्त ने हर संभव प्रयास किया था। परन्तु दुर्भाग्यवश उनकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, जिसके कारण दत्त पूरी तरह से टूट गए थे। लेकिन बाद में , वर्ष 1970 और 1980 के दशक में, फ़िल्म “कागज़ के फूल” एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई। जिसका अंदाजा हम एशिया और यूरोप के 13 देशों द्वारा फिल्म स्क्रीनिंग के लिए इस फिल्म के प्रिंट को पाने के लिए अनुरोध किए जाने से लगा सकते हैं। इसके साथ-साथ विदेशी फिल्म स्कूलों/विश्वविद्यालयों में भी फिल्मों के प्रशिक्षण के लिए “कागज के फूल” फिल्म के प्रिंट का प्रयोग किया जाने लगा। कुछ समय बाद यह फिल्म भारत में दोबारा रिलीज़ हुई, जिसे लोगों द्वारा अद्भुत प्रतिक्रिया मिली। यहां तक आज-कल इस फिल्म को अधिकांश विश्वविद्यालयों में और फिल्मजगत में शोध करने के लिए उदाहरणस्वरूप अध्ययन किया जाने लगा।

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